ग्रामीणों ने हाथों पर मेहंदी से लिखे “मै भी चौकीदार हूँ ” कहा ये है प्रचार करने का नया अंदाज

बदलते वक्त के साथ चुनाव प्रचार का ट्रेंड भी बदल रहा है। उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं है। मौजूदा लोकसभा चुनाव में यह बदलाव साफ नजर आ रहा है।

दूसरी लोकसभा के गठन से लगातार मतदान करती आ रहीं पौड़ी गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र के ग्राम सलियाणा (गैरसैंण) निवासी बुद्धि देवी और उत्तरकाशी के होटल व्यवसायी दर्शन सिंह पंवार के उक्त कथन यह बयां करने को काफी हैं कि बदलते वक्त के साथ चुनाव प्रचार का ट्रेंड भी बदल रहा है। उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं है। मौजूदा लोकसभा चुनाव में यह बदलाव साफ  नजर आ रहा है। अब न तो पहले जैसे दीवारों पर नारे, बैनर, पोस्टर दिख रहे और न बिल्ले, स्टीकर आदि ही। जाहिर है इससे लोग भी सुकून में हैं। नतीजतन, सियासतदां ने अब सभा, रैली व नुक्कड़ सभाओं के जरिये माहौल बनाने पर फोकस करने के साथ ही प्रचार के पारंपरिक तौर-तरीकों को बॉय-बॉय कह दिया है।

इसे निर्वाचन आयोग की सख्ती का असर कहें या फिर हर स्तर पर बढ़ी जागरुकता,  बात चाहे जो भी हो, मगर अब चुनाव के दौरान वैसी रंगत नहीं दिखती, जो दो दशक पहले तक नजर आती थी। अतीत में झांकें तो चुनाव की घोषणा होते ही उत्तराखंड की वादियां भी प्रत्याशियों व सियासी दलों के प्रचार वाहनों में लगे लाउडस्पीकर के शोर से गूंजने लगती थीं। सार्वजनिक स्थलों के साथ ही दीवारें नारों से रंग जाती थीं। प्रचार के लिए झंडियां टंग जाती थीं, मगर अब ऐसा नजर नहीं आता।

मौजूदा लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पहाड़ से मैदान तक नजर दौड़ाएं तो चुनाव प्रचार वैसा नहीं दिखता, जैसे पहले हुआ करता था। अब सियासी दलों ने प्रचार का पूरा फोकस नुक्कड़ सभाओं, जनसभाओं व रैलियों के जरिये भीड़ जुटाकर अपने पक्ष में माहौल बनाने पर किया हुआ है। इसके अलावा घर-घर संपर्क करने पर भी जोर है। सबसे बड़ी बात ये कि अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच बनाने के लिए अब सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा है।

इससे मतदाता भी खुश हैं। सलियाणा की बुद्धि देवी कहती हैं कि समय के साथ बदलाव भी जरूरी है, लेकिन अच्छा ये है कि यह सुकूनभरा है। वैसे भी शोर-शराबे से क्या करना, नेता भी तो पांच साल में ही नजर आते हैं। उत्तरकाशी के दर्शन सिंह चुनाव प्रचार में आए इस बदलाव के लिए आयोग की सख्ती को भी श्रेय देते हैं।

पहाड़ों में चुनाव को लेकर रहती है विकास की  आस 

बुद्धि देवी (निवासी ग्राम सलियाणा, गैरसैंण-चमोली) का कहना है कि चुनाव कोई भी हो, घोषणा होते ही पहाड़ की वादियां लाउडस्पीकर के शोर से गूंजने लगती थीं। प्रचार वाहन दौडऩे लगते थे, जो पार्टियों व प्रत्याशियों के बिल्ले, स्टीकर बांटते थे और बच्चे इनकी तरफ झपटते थे। जगह-जगह दीवारों पर नारे लिखे जाते थे। अब ऐसा नहीं है। सभाओं, रैलियों व बैठकों पर हर किसी का जोर है। यह अच्छा भी है। शोर-शराबा नहीं होता, जो सुकून की बात है।

दर्शन सिंह पंवार (निवासी उत्तरकाशी) का कहना है कि पहले हल्ला-गुल्ला खूब होता था और एक प्रकार से चुनावी रंगत में हर कोई रंगा नजर आता था। मगर, अब शोर-शराबा नहीं है। निर्वाचन आयोग ने चुनाव प्रचार के मद्देनजर जो सख्त कदम उठाए, उससे यह बदलाव आया है। यह अच्छा है। अब कोई भी दल अथवा प्रत्याशी किसी को बरगला नहीं सकता। साथ ही राजनीतिक कटुता भी नहीं रहती। है

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