बर्फ पड़ने पर काकरे की लकड़ी (फड़क्याटे) काम आते थे

इन दिनों पहाड़ों के गांव में जब बर्फ पड़ जाती थीं तो जलाने की लकड़ी काकरे में रखते थे। काकरे के नीचे चूल्हा होता था।
काकरे की लकड़ी ही भोजन बनाने के काम आती थी। क्योंकि बाहर की लकड़ी भीग जाती थीं बर्फ के नीचे दब जाती थीं।
चूल्हे पर भट्ट, मारच्या भुने जाते थे। जब बारिश, बर्फ नहीं रुकती थीं तब तब इसे बुकाया जाता था। अखरोट भी खाये जाते थे।

गहथ की दाल सिलोटे में पीसी जाती थीं। कोई रोटी बनाता। तो कोई फाणु बनाता था। फाणु के साथ भात खाया जाता था।
कोई झंगोरा बनाता था। उसमें भुटि मिर्च भी लाजबाब होती थी।

प्राकृतिक धारा से एक दो बंठों का काम चल जाता था। चैन पशु भी बर्फवारी में कम पीते थे। कोई गर्म पाणी पिलाते थे। ओबरे
(ग्राउंड फ्लोर ) में पशुओं के दरवाज़े होते थे उसमें पिल्टा पिरूल
लगाया जाते था। ताकि पशु बर्फ़ीली हवा से बच सकें।

बर्फ सूखने में जब 5 6 दिन लग जाते , इस बीच भीमल काटा जाता था। भीमल की पत्तियां , पशु खाकर ज्यादा दूध देते थे।
भीमल की डंडिया (केड़े) को गाड़, गदेरों में चाल बना कर डुबाया जाता हैं। 4 5 माह बाद पाणी से निकाला जाता था। उससे रस्सी निकलती थीं। जो पशुओ को बाँधने के लिए काम आती थीं। दांवे भी बनाये जाते हैं।घसियारी के जुड़खे बनते थे। 5 6 दिन बाद जब बर्फ रिस जाती, तब घसियारी जंगलों को इन्हीं जुड़खो को ले जाती थीं।एक किनारेपहाड़ से दूसरे पहाड़ तक उनका गीत से वार्तालाप चलता था।

समय के साथ साथ हम सब अब अंग्रेज बन गये हैं। लेकिन गांव की पुराणी सभ्यताओं , रीति रिवाजों को भूल जाना दिल दुखाता है।आईय उस सुनहरे बर्फ के पलों को याद करते हैं।

सभी लोग गांव से निकले हैं। यहाँ तक श्री लक्मी नारायण नेहरू, भी गांव के थे। वे कौल जम्मू कश्मीर के पंडित थे। उनके बेटे हुए गंगा धर कौल,और उनके पुत्र मोती लाल कौल। मोती लाल के बेटे हुए जवाहर लाल कौल। नेहरू शब्द एक नहर से आया जो कश्मीर में थीं। उनके घर के बगल में नेहरू नहर बहती थीं। वही नामकरण संस्कार बना। जो बाद में प्रसिद्ध हुआ।
वे कौल से नेहरू ठीक ऐसे हुए , जैसे काकरे की लकड़ी से एलपीजी। कुल आबदी से आधे से अधिक आबादी के पास एलपीजी नहीं है। गांव महान था है। उसे कभी नहीं भूला जाना चाहिए।

 

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