मलीदेवल गांव का बेटा विद्यासागर नौटियाल बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी का अध्यक्ष बना।

एक जमाने में राजनीति में सागर जी की तूती बोलती थी। उन्होंने पहले कम्युनिस्ट प्रमुख रहे पीसी जोशी के सानिध्य में राजनीति की। उनकी पोप्लोरटी तब बढ़ी जब बनारस बनारस हिंदू आंदोलन चला। नेहरू, पंत परेशान रहे। वे उन्हें प्रोफ़ेसर बनाना चाहते थे। लेकिन सागर आंदोलन करते रहे। 58, 59 की बात होगी।
यही कारण था। वे अध्य्क्ष रहे। और आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के प्रमुख भी रहे। उन्होंने वियाना में अध्यक्षता की। उस बड़ी बात थीं। उन्हें कांग्रेस में लाना चाहते थे। लेकिन उन्होंने पीसी जोशी के साथ काम करने का मन लगाये रखा। उन्हें उत्तरप्रदेश से पीसी का ऑर्डर मिला कि जाओ उत्तराखंड के गांव में काम करो, वो न चाहते भी आये। यूपी में रहते तो बर्धन, सुरजीत जैसे बनते। यह सोचा होगा। लेकिन उन्होंने गढ़वाल में कम्युनिस्ट पार्टी को खड़ा किया। वे देवप्रयाग से विधायक भी रहे। भीम अकेला तब लिखी,
जिसमें उन्होंने विधायक टूर यात्रा रुद्रप्रयाग, चौरास, कीर्तिनगर, हिंडोला खाल से अपने गांव तक तक जिक्र किया है। उपन्यास : उलझे रिश्ते, भीम अकेला, सूरज सबका है, उत्तर बयाँ है, झुण्ड से बिछुड़ा, यमुना के बागी बेटे।भीम अकेला को उपन्यास का दर्जा मिला। फट जा पंच धार भी बहुत फेमस हुई।जिसमें है रंवाई जौनपुर में पंचायत बैठती है। एक दलित लड़की के लिए। एक धार थीं एक गांव था बीच मे पंचायत बैठती है। पंचायत उठती है और फैसला देते हैं। जैसे आज हरियाणा में होता है।भेंसा कु कटिया, टिहरी की नथ उनकी बहुत प्रसिद्ध कृति है। निश्चित रूप से उन्हें 1990 से लेकर 2010 तक खूब पढ़ा गया। वे चोटी के साहित्यिक रचना धर्मी थे।

एक दिन , 1998 की बात होगी। हम लोग साथ टिहरी से देहरादून
कमांडर जीप से साथ देहरादून आ रहे थे। जीप में सवारियां आपस में बात नहीं करती थीं। मैं तब ज्यादा परिचित नहीं था। लेकिन उन्हें जानता था। आगराखाल में चाय, पाणी के बाद अदरक लेने बैठ गए हम लोग। उन्होंने मेरा परिचय पूछा। मैंने कहा प्रदीप बहुगुणा की जगह 1996 में नव भारत टाइम्स मेंलिख रहा हूँ। प्रदीप उनका भांजा था।प्रदीप लखनऊ चले गए थे हिदुस्तान में। सागर जी का मेरे प्रति रुचि बढ़ गई थीं। उन्होंने बताया कि, आगराखाल से बढ़िया अदरक चकराता का है। मुझे भी उनकी रचनाओं के बारे में ज्यादा पता नहीं था। तो क्या गंभीर जिक्र करते। इतने बड़े आदमी से। बहुत बाद में पता लगा, 1949 से 60 तक उनका लेखन कार्य चला 60 से 90 तक राजनीति, फिर 90 से 12 फरबरी 2012 तक लेखन। उस दिन उन्होंने विदा ली। अगले दिन एक प्रमुख अखबार अमर उजाला ने पूरा एक पेज दिया था उन पर। वाकई वे काबिल चिंतक थे। जिन्होंने साहित्य को दिया ही कुछ।

पट्टी जुवा में मलीदेवल गांव बहुत सुंदर गांव था। दोबाटा से 3, 4 मील आगे। सड़क के नीचे। यहाँ सागर जी ने वन अफसर नारायण दत्त नौटियाल के घर 29 सितंबर 1933 को जन्म लिया।
हम लोग जब सहारा टीवी में थे, तब यह गांव जलसमाधि ले रहा था। 2005 की अंतिम दीपावली मैंने, शिव प्रसाद जोशी, राकेश चंद्रा, मंजुल सिंह मंजिला, दूसरे न्यूज, जी न्यूज के मनमोहन भट्ट, दिनेश सिंह ने गांव में कवर कर मनाई। हम लोग भी इस गांव के इतिहास के गवाह बने। इतने सारे एंगिल से न्यूज़ नोयडा में बैठे
हमारे सर्वोच्च कमांडर श्री प्रभात डबराल को पंसद थी। क्या लाइव था तब, 30 , 30 किलोमीटर से बसों से , कमाण्डर से लोग टीवी मे लाइव देखने आते थे। दिन में 8, 9 लाइव। फिर बीच बीच में खबरे।
उस यूपी वाली स्क्रीन पर या मुलायम सिंह रहते थे। या मालीदेवल वाली बेल्ट। मुलायम चीफ मिनिस्टर थे। हालांकि सागर जी तब देहरादून रहते थे। लेकिन वे एक एक पत्थर को जानते थे।
अपने गांव को डूबने का दर्द सागर जी में रहा होगा। क्या खेत थे मालीदेवल के उपजाऊ। साल भर में कोदा, झंगोरा को लगा के तीन फसले देते थे खेत। मालदिओल भी कहते थे घर की भाषा में।
यहाँ और सिराई में कभी भैंसों की लड़ाई कराई जाती थीं।
उससे आगे सिराई था। सिराई से रैका पट्टी को जोड़ने वाला झूला पुल था। इस पुल से कामरेड गोविंद सिंह नेगी, कामरेड विद्यासागर नौटियाल कई बार प्रतापनगर पैदल गए। आये। लोगों के बीच रहे।
उनकी आवाजें लखनऊ में उठाई। मजदूरों के आंदोलन में रहे।
तब वह लाल घाटी के नाम से जानी गईं। by – शीशपाल गुसाईं

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