मसूरी में लिखा गया था भारत के इतिहास का पहला प्रेम पत्र, देखिये है इस प्रेम पत्र की कहानी

जैसा की आप सब जानते हो कि14  फरवरी को पूरे विश्वभर में वेलेंटाइन डे मनाया जाता है। इस  दिन का  कुछ खास लोगों को शिद्दत से इंतजार होता ताकि वो उस शख्स से अपने दिल की बात कह सकें जो उनकी जिंदगी में खास मायने रखता है। रिशते शुरू होते हैं और फिर उन्हें मजबूत बनाया जाता यह प्यार का दिन, इजहार का दिन, अपने जज्बातों को शब्दों में बयां करने के लिए इस दिन का हर धड़कते हुए दिल को बेसब्री से इंतजार रहता है. प्यार के परवानों के लिए ये दिन खुशियों का प्रतीक माना जाता है. हर प्यार करने वाले शख्स के लिए ये दिन अलग ही अहमियत रखता है.

सर्व प्रथम वैलेंटइन डे की शुरुआत अमेरिका में सैंट वैलेंटाइन की याद में हुई थी. सबसे  पहले यह दिन अमेरिेका में ही मनाया गया, फिर इंग्लैंड में इसे मनाने की शुरुआत हुई. इसके बाद धीरे-धीरे पूरे विश्व में ये दिन मनाया जाने लगा. अलग-अलग देशों में ये दिन अलग नामों के साथ भी मनाया जाता है.  चीन में इसे नाइट्स आफ सेवेन्स, जापान व कोरिया में वाइट डे के नाम से जाना जाता है.

मसूरी में लिखा गया था भारत का पहला प्रेम पत्र

1843 में कुछ ऐसी ही दास्तान मसूरी की वादियों में लिखी गई. यहां एक प्रेमी ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए एक प्रेम पत्र लिखा. जिसे भारत के इतिहास में पहला प्रेम पत्र माना जाता है मसूरी के मशहूर इतिहासकार गोपाल भारद्वाज बताते हैं कि भारत में लिखे गये इस पहले प्रेम पत्र को लिखने वाले व्यक्ति का नाम जॉन मैकेनन था जो कि पेशे से एक टीचर थें. जॉन मैकेनन मसूरी के लेंडेड स्टेट स्कूल में लैटिन भाषा के अध्यापक थे. उन्होंने 1843 में वैलेंटाइन-डे के खास मौके पर अपनी पत्नी एलिजाबेथ लुईस से प्यार का इजहार करने के लिए प्रेम पत्र लिखा था. इस प्रेम पत्र में जॉन अपने दिल की बातें खोल कर रख दी थी. जॉन ने अपने पत्र में लिखा था कि ‘तुम्हारे आने से मेरी जिंदगी के मायने बदल गये हैं, तुम्हारे आने से जिंदगी में नई प्रेरणा जगी है. जॉन पत्र में लिखते हैं कि तुम्हारे आने से पहले मेरी जिंदगी के कोई मायने नहीं थे, तुम्हारे आने के बाद जीने का बहाना मिल गया है

गोपाल भारद्वाज बताते हैं कि उस दौर में भारतीय डाक सेवा की स्थिति बहुत बेहतर नहीं थी. उस वक्त पत्र कई महीनों बाद पहुंचता था. जॉन मैकेनन और एलिजाबेथ लुईस के कुछ ऐसे ही लेटर्स का जिक्र उनके करीबी दोस्त एडम माइगन ने अपनी किताब मसूरी मर्चेंट द इंडियन लैटर्स में किया है. ये बुक लिखने के 50 साल बाद पब्लिश हुई थी. इस प्रेम कहानी के हीरो जॉन मैकेनन की मौत  32 साल की छोटी उम्र हो गई थी. मेरठ के सेंट जोंस चर्च में आज भी उनकी कब्र मौजूद है. आज भले ही कम लोग जॉन मैकेनन को जानते हैं, लेकिन इनके द्वारा शुरू की गई इस परंपरा को आज हर प्रेमी निभाता है.
गोपाल भारद्वाज कहते हैं कि प्यार किसी से भी हो सकता है. इसी के इजहार का दिन वेलेंटाइन डे है. वे कहते हैं कि आज के दौर में पूरी तरह से वैलेंटाइन डे का बाजारीकरण कर दिया गया है. जिससे इस दिन का असली महत्व समाप्त होता जा रहा है. 
ऐसा माना जाता है कि वैलेंटाइन-डे मूल रूप से सैंट वैलेंटाइन के नाम पर रखा गया है. लेकिन सैंट वैलेंटाइन के विषय में ऐतिहासिक तौर पर विभिन्न मत हैं. 1969 में कैथोलिक चर्च ने कुल ग्यारह सैंट वैलेंटाइन के होने की पुष्टि की और 14 फरवरी को उनके सम्मान में पर्व मनाने की घोषणा की. इनमें सबसे महत्वपूर्ण वैलेंटाइन रोम के सैंट वैलेंटाइन माने जाते हैं. 

 

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