महान गायक नरेंद्र सिंह नेगी गढ़वाल हिमालय की हर पुराणी चीज के रोम रोम में बसे हैं

महान गायक नरेंद्र सिंह नेगी  उत्तरकाशी में जब पोस्टेड थे तब वे पौड़ी से टिहरी , नगुण चिन्याली,बड़ेथी, धरासू , डुंडा होते हुए से उत्तरकाशी जाते थे। आते थे। बसों में जाना होता था। उन्होंने,
रेश्मी रुमैला …
चिन्याली, बड़ेथी .. पर एक कल्पना साकार कर दी
चिन्याली, बड़ेथी का नाम गढ़वाल में जाना जाने लगा। बगल
धरासू प्राचीन ऐतिहासिक था
ये दो छोटे बाज़ार थे। अब बड़े हो गए। उस जबरदस्त गीत की हनक, भंडारसुय पट्टी, बिष्ट , नगुण ,गमरी, बरसाली, धनारी पट्टी यहाँ तक सरलनोल तक शादी विवाह, मुंडन, या अन्य समारोह में रात के 1 बजे तक चौक, आंगन तक रहती थीं। क्योंकि रुमाल के साथ उनके शहर चिन्याली, बड़ेथी का नाम आया था। ये दोनों शहर
सौदे पत्ते के प्रमुख केंद्र हैं। गांव का जुड़ाव है इन से।

वे गढ़वाल हिमालय की हर पुराणी चीज के रोम रोम में बसे हैं।
वो तो उत्तराखण्ड बन गया, अब लोग अपनी बोली भाषा बोल देते हैं।नीचे उतर आए लोग गढ़वाली , कुमाऊँनी, जौनसारी, रवांई बोलना पसन्द कहाँ करते थे ? फिर भी आज मिक्स है। जो लोग अपनी जड़ों को भूल गये,और देहरादून में स्याने , फ़ोनदया हो गए हैं। उन पर फब्तियां कसते हुए उन्होंने गाया कि मेरे को पहाड़ी पहाड़ी मत बोलो मैं देहरादून वाला हूँ। इस गीत में उनके बेटे के अक्स ज्यादा दिखे। लेकिन जड़ में तो नेगी दा होंगे। इस गीत का असर यह पड़ा कि, वास्तव में लोग गांव को याद करने लग गए।
सरकारी स्तर पर पलायन आयोग बन गया। इसका मुख्यालय
पौड़ी गढ़वाल खोल दिया गया। गीत मौलिक हो, बड़ी दूर तक चोट करता है। और होंसलों को सम्भालकर रखता है।

पहाड़ी बाँदो के बारे में भी उन्होंने सुंदर प्रस्तुति की है। बांद बोदी सैरी दुनिया तुइक ..मन की बिछे बांद तू

सुन रे दीदा तेकु आयु चा बौजी को सवाल …

कु होली ऊँची डांडियों मा …

हिट भुला हाथ खुटा , खाण कमाण छि कला …

भटकणु छै स्वर्ग माँ बाटू खोज्याणु छो …

पहाड़ों से बैर किले, गैरसैंण गैर किले ….

न जाने कितने शानदार गीत दिए है। नेगी दा ने। जो बचपन की याद दिलाते हैं , हमारे बचपन क्या, पिता के बचपन की याद भी …
– शीशपाल गुसाईं

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