जनरल लखेड़ा ने कभी नहीं कहा कि, मैंने कश्मीर, पंजाब में युद्ध लड़ा आप सांसद का टिकट दो

जनरल लखेड़ा ने कभी नहीं कहा कि, मैंने कश्मीर, पंजाब में युद्ध लड़ा आप सांसद का टिकट दो  उनका धैर्य ही था उन्हें राज्यपाल बना दिया गया
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गढ़वाल के पहले राज्यपाल श्री लेफ्टिनेंट जनरल  श्री मदन मोहन लखेड़ा की कहानी सुन लीजिए।
1996 में श्री विजय बहुगुणा पौड़ी से कांग्रेस उम्मीद वार के रूप में जब सांसद का चुनाव हार गए थे। उस साल उनके भाई बीजेपी के खंडूड़ी जी भी हारे थे। बहुगुणा जी ने टिहरी गढ़वाल लोक सभा
का रुख किया। 1998, 1999, 2004 का चुनाव बहुगुणा जी
मानवेन्द्र शाह से हारते रहे।
उस दौरान लखेड़ा जी भी रिटायरमेंट हो रहे थे।
और कांग्रेस से जुड़ गए थे। तो चर्चा हुई थीं कि जनरल
लखेड़ा जी लोक सभा का चुनाव कांग्रेस के टिकट
पर लड़ेंगे। लखेड़ा जी पीएम रहे श्री नरसिंह राव के रिस्तेदार हैं।
उनकी टॉप लेबल में पहचान थीं।

बाबजूद उन्होंने कभी पत्ते नहीं खोले। न प्रचार किया। बहुगुणा
का कभी विकल्प बनने की नहीं सोची, देहरादून, टिहरी, उत्तर काशी से सर्वे, जानकारी कर,चुप चाप नई दिल्ली कांग्रेस मुख्यालय जाते रहे। फालतू की लॉबिंग नहीं की। देहरादून के अखबारों
में कभी छपे नहीं। न किसी से बुलाया कि जनरल लखेड़ा सीमा पर रहे। ऑपरेशन ब्लू स्टार में रहे, इस लिए उम्मीदवार ठीक हैं।

इधर, बहुगुणा 2007 का उप चुनाव जीते, उधर सोनिया गांधी, उनकी टीम की नज़र उन पर थीं। उन्हें उप राज्यपाल , बाद में उप राज्यपाल बना दिया गया। गढ़वाल मंडल के इतिहास में
वे अब तक पहले और अंतिम राज्यपाल हैं।

आपकी योग्यता है, सब्र है सब देख रहे सब जानते हैं। टाइम पर सब होता है।

जनरल लखेड़ा का का जन्म दिनांक 21 अक्टूबर 1937 को जनपद टिहरी गढ़वाल के पट्टी बरजुला के जखंड गांव में हुआ था। उनके पिता स्व. जयनंद लखेड़ा, एक टीचर थे। उच्च शिक्षा राष्ट्रीय इंडियन मिलिटरी कॉलेज (फकटउ), देहरादून (1949 से 1951 तक) से ली। तत्पश्चात, नेशनल डिफेंस अकादमी, खड़कवासला, पुणे से प्रशिक्षण लिया और दिनांक 08 जून 1958 से इंडियन मिलिटरी कॉलेज, देहरादून से प्रशिक्षण लेकर भारतीय सेना में कमीशंड ऑफिसर बने।

सन् 1961 में गोवा ऑपरेशन, 1965 व 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में जम्मू-कश्मीर सेक्टर में आपने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दक्षिण भारत के वेलिंगटन के डिफेंस सर्विसेज स्टॉफ कॉलेज से और स्कूल ऑफ आर्टिल्लरी में लॉग गन्नरी स्टॉफ कोर्स में प्रशिक्षण प्राप्त किया।

सन् 1967 से 1970 तक स्कूल ऑफ आर्टिल्लरी में और तत्पश्चात, 1978 से 1981 तक कॉलेज ऑफ कोम्बाट, मऊ में अनुदेशक के पद को सुशोभित किया। दिसम्बर 1975 से जुलाई 1978 तक जम्मू-कश्मीर में कुमाऊं रेजीमेंट के चतुर्थ बटालियन का सुचारू रूप से संचालन किया।

काउंटर इंसरजैंसी ऑपरेशन के आप विशेषज्ञ माने जाते हैं। सन् 1981 से 1982 तक आप मणिपुर ब्रिगेड के डिप्टी कमांडर रहे। ब्रिगेडियर के पद से पदोन्नति पाकर आप कानपुर ब्रिगेड के कमांडर बने।

पंजाब में 1984 में हुए ‘ब्लू स्टॉर ऑपरेशन’ तथा 1984 में कानपुर में हुए दंगों पर नागरिक प्रशासकों को सहायता देने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

आप इन महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए 15 जनवरी 1985 और 15 अगस्त 1985 (दो बार) चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कमेन्डेशन कार्ड से पुरस्कृत किए गए। तत्पचात उन्हें कश्मीर घाटी के सब एरिया कमांडर के पद पर नियुक्त किया गया।

जिस कश्मीर की हर बार चर्चा रहती है। वहां भी उनका योगदान
खासा रहा। संवेदनशील कश्मीर घाटी में चौतरफा व विकट समस्याओं को हल करने में उनकी समर्पित, संवेदनशीलपूर्ण,व प्रोफेशनल क्षमता एवं निष्ठापूर्ण सेवाओं के लिए राष्ट्रपिता ने 26 जनवरी 1991 में ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल’ से अलंकृत किया गया। उन्होंने सिकंदराबाद स्थित इन्फेटरी डिवीजन को कमांड भी किया। सितंबर 1992 में ले. जनरल की पदोन्नति मिली और सेंट्रल कमांड हेडक्वार्टर्स में चीफ ऑफ स्टाफ के पद पर नियुक्त किए गए। जून 1993 में भारतीय थल सेना के एडजुटेन्ट जनरल बने। सेना के मानव संसाधन व सेवा शर्तों और डिफेंस सिविलियनों की जनशक्ति आयोजना तथा प्रबंधन कार्यों की नीति तैयार करने में बड़ा योगदान रहा। कुमाऊं रेजिमेंट के कर्नल कमांटेंट भी रहे। आपकी विशिष्ट परम सेवाओं के लिए राष्ट्रपति ने 26 जनवरी 1995 ‘परम विशिष्ट सेवा मेडल’ से
सम्मानित किया। लखेड़ा जी देहरादून, गुड़गांव में दोनों जगह रहते हैं। जनरल लखेड़ा जी के बारे में इस लिए जरूरत पड़ रही है।
कि उत्तराखंड में फौजी की जोक , हर चुनाव में कल बलाने लगती है। फ़ौज में वह पहले बटर टोस्ट खाते है । और फिर बाद में नेता लोगों का हक ।

शीशपाल गुसाईं

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