5000 सालों से दलितों का शोषण हुआ

अम्बेडकर जी के सिद्धांतों को आगे बढ़ाने वाले  श्री चंद्र सिंह, रिटायर्ड आईएएस श्री चमन लाल प्रद्योत रिटायर्ड, आईपीएस
ये लोग अपने लोगों को आगे बढ़ा रहे हैं तो क्या गलत कर रहे हैं ? आखिर चंद्र सिंह , प्रद्योत जी जैसे लाखों में मिलते हैं
जो सचमुच में अंबेडकर का अर्थ समझते हैं।

5000 सालों से सवर्णों ने दलितों का शोषण
किया। दलित का अर्थ पीड़ित, शोषित, दबा हुआ, खिन्न, उदास, टुकडा, खंडित, तोडना, कुचलना, दला हुआ, पिसा हुआ, मसला हुआ, रौंदा हुआ, विनष्ट हुआ होता है

अब वह इन्ही लोगों की बदौलत, वह बराबरी, समानता का अधिकार पा रहा है। तो क्या गलत है।

श्री चमन लाल प्रद्योत ,आईपीएस अफसर रहे। जिला पौड़ी के रहने वाले हैं। अब देहरादून वसन्त विहार में रहते हैं।
सोसियल मीडिया में बेहद सक्रीय हैं।  बात 1976 , 77 की है। उन्हें बिजनोर का पुलिस
कप्तान बनाया गया। वे लखनऊ रेलवे स्टेशन में  बिजनोर जाने के लिए आ गए थे।
चन्द्र सिंह उस वक्त लखनऊ में अनुसूचित जाति आयोग के डिप्टी कमिश्नर थे। वे भी स्टेशन में आ गए थे।
पुलिस कप्तान बड़ी चीज होती थी। सारे परिचित थे।  जैसे ही गाड़ी में बैठने वाले थे। वैसे ही सचिवालय
से स्टेशन मास्टर को फोन आया, प्रद्योत जी से बातकराने के लिए उस वक्त मोबाइल नहीं होता था।
कि आपका ऑर्डर चेंज हो गया है। सारी खुशी मायूसी में तब्दील हो गई। वो ऑर्डर चेंज कराया था। आईपीएस
प्रेम दत्त रतूड़ी ने। प्रेम दत्त गए बिजनोर कप्तान बन कर। प्रेम दत्त रतूड़ी जी एन डी सरकार में डीजीपी भी रहे। वे
टिहरी/ देहरादून के रहने वाले हैं।  प्रद्योत जी भी उत्तर प्रदेश में एडीजी बन कर रिटायर्ड हुए।

श्री चंद्र सिंह ,1994 में उत्तर प्रदेश बस्ती जिले में डीएम थे। वहां तब गरीब दलित लोगों की दबंग सवर्ण झोपड़ी में  आग लगाए करते थे। लेखपाल, तहशीलदार के माध्य्म से इस तरह की सूचनाऐ 15 दिन में मुख्यालय आती थी। जबकि उसी दिन पहुँचने के आदेश थे। सूचना पर पुलिस कारण बता देती थीं। और खाना पूर्ति हो जाया करती थीं।  चन्द्र सिंह , ऐसी घटनाओ को गंभीरता से लेने लगे। तहशील दार को सूचना नहीं होती थीं। जबकि डीएम को होती थीं। उन्होंने अपने संपर्क बढ़ाये। खुद मौका
मुआयना करते थे। एक घटना उनके गले नहीं उतरी तो उन्होंने खुद गांव में जली घोपडी का मुआयना किया। दो गरीब पाँउ से कमर तक जले हुए थे। चन्द्र सिंह ने  जब सबके सामने पूछा तो वही जबाब कि हवा से झोपड़ी
में आग लग गई। फिर उन्होंने सभी लोगों तहसीलदार,
सीओ , थानेदार को एक किलोमीटर दूर जाने को कहा
फिर अकेले में 2 घन्टे तक पीड़ित पक्छ की गहराई
में गए। फिर उन्होंने भरोसा दिया कि सच बोलो मैं इस जिले
बाप हूँ। फिर उन्होंने साफ साफ कहा कि दबंग ने उनकी
इच्छा न करने पर उनके प्राइवेट पार्ट को जला दिया था। फिर झोपड़ी फूंक दी गई। और हिदायत के साथ चले गए।
डीएम के पास इस बयान से बस्ती से लखनऊ तक
भूचाल आ गया। सीओ को उन्होंने फटकार। तो कप्तान
का डीएम को फोन आया कि पुलिस काम नहीं करेगी।
सारे लोग हथियार पुलिस लाइन में जमा कर रहे हैं।
चंद्र सिंह ने प्रमुख सचिव गृह से बात की। प्रमुख सचिव
ने उन्हें रात के खाना खाने के बाद बात करने की बात की।
सचिव उनकी ईमानदारी से वाकिफ थे। और वे चाहते थे
कि थके हुए सिंह खाना खा ले। फिर सचिव का फोन आया
कहा कि आप आराम से सो जाएं। सुबह बात होगी।
दिन तक डीआईजी का उन्हें फोन आया कि मैं आप से
मिलना चाहता हूँ। वे एक गेस्ट हाउस में मिले। पुलिस ने आंदोलन
वापस लिया। सीओ ने माफी मांगी। दबंग गिरफ्तार हुआ।
इस तरह दलित को न्याय मिला। लेकिन यूपी में हर जिले
चंद्र सिंह थोड़े नही था है ।

कहने का मतलब है किसी के साथ सर्विस में अन्याय हो रहा
किसी के गांव में शोषण हो रहा है। इन दोनों अधिका रि यो
के अलावा और भी जरूर होंगे। ज्यादातर दलित आईएएस, आईपीएस, आईएफएस अपने आप रहते हैं। वे दलितों के नाम
पर बिक जाते हैं। और फैसला कर देते हैं।
भीम राव अम्बेडकर की जयंती मनाने का मतलब यह
तो होना चाहिए कि, गरीब लोगों का शोषण बंद हो। उन्हें जीवन
का हक मिले।

शीशपाल गुसाईं

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