उत्तराखण्ड के *विकास पुरुष* लोकसभा चुनाव प्रचार में क्यों नहीं ?

जिस दिन श्री अनिल बलूनी राज्य सभा सांसद बने थे, उस दिन मैंने समीक्षा लिखी थीं कि, राजीव गांधी भी बलूनी की उम्र में प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने कई नेताओं को पीछे छोड़ा था। जो बीस, तीस साल तक पार्टी को सींचते रहे। राजनीति में
होता है।आजादी के बाद कइयों का इतिहास रहा है। मेरी व्यक्तिगत रुप से उनके प्रति दुर्भावनाएं नहीं हैं, न पूर्वाग्रह। लेकिन उनकी उत्तराखण्ड से इस समय अनुपस्थित कुछ पंक्तियां लिखने को कहती हैं 
पिछले दिनों देहरादून के अखबार भरे हुए रहते थे कि, उन्होंने उत्तराखण्ड के दूरस्थ और अविकसित इलाकों का संज्ञान लिया और अपनी निधि से पैसे भेजे। सरकारी अस्पतालों में आईसीयू स्थापित हुए। बहुत अच्छी बात थीं। यदि अखबारों की बात सच है तो उन्हें यह मुद्दे भुनाने चाहिए। 

कुछ तो फर्क पड़ेगा। यह वक्त है।  जब श्री राज बब्बर उत्तराखण्ड का पैसा पंजाब, और कर्नाटक भेज रहे हैं। तब
उनका झुकाव, आराकोट से लेकर अस्कोट तक रहता है, इससे बड़ी बात क्या हो सकती है।  अखबारों में बड़ा बड़ा छपना साकार भी हो जाएगा। यदि एक साल में कुछ किया है तो प्रचार में क्यों नहीं आ रहे हैं। या क्यों नहीं आये ? उनके आने पर बीजेपी उम्मीदवारों को फायदा मिल सकता है।यह सच है उनके पास  बीजेपी देश के मीडिया की जिम्मेदारी है।
उनके दोस्त श्री संबित पात्रा चुनाव लड़ रहे हैं फिर भी व्यस्तता के बावजूद, अपने राज्य के लिए विकास पुरुष को टाइम निकालना चाहिए।

मुझे कल गांव से फोन आया था कि कि कल कंडीसौड़ में श्री विजय बहुगुणा  का हेलीकॉप्टर आया था। सभा हुई थीं। उससे पहले दिनों वे डामटा, पुरोला, प्रचार में गए थे।  जबकि बहुगुणा राज्य सभा जाने और लोक सभा का टिकट पाने में खेत रहे। और श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के जिम्मे तो सभी 13 जिले हैं। औसतन वे 7 ,8 सभा एक दिन में कर रहे हैं। वे अखबार
फेसबुक हेलीकॉप्टर में ही देखते हैं। ऐसे में बीजेपी को अभी बड़े विकासरूपी मैन पॉवर की आवश्यकता है।

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