सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत जिन्होंने शहद की योजना को जमीन पर उतारा

उत्तराखंड सहकारिता विभाग की राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजन, कार्यक्रम निदेशालय राजपुर रोड देहरादून उत्तराखंड में मधुमक्खी पालकों की किस्मत बदलने जा रही है। बड़ी संख्या में गढ़वाल व कुमाऊं मंडल के साधारण किसानों को इससे जोड़ा जा रहा है। उत्तराखंड में 120 मैट्रिकट टनशहद (हनी ) बनाने की योजना पर काम किया जा रहा है।

राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना ने राज्य में 7 विकास खंडों को मधुमक्खी पालन के लिए चिन्हित किया है इसमें उत्तरकाशी में भटवाड़ी चमोली में जोशीमठ,दसौली पोखरी, देहरादून जनपद में चकराता तथा नैनीताल जिले में कोटाबाग व भीमताल ब्लॉकों में मधुमक्खी पालन होगा।
1000 गढ़वाल से 1000 कुमाऊं मंडल से किसानों को चिन्हित किया गया है 2000 किसानों को मधुमक्खी पालन के लिए राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना चार करोड़ 88 लाख रुपए की मदद करेगा। इसमें मधुमक्खी पालक किसानों को समितियों के माध्यम से पंडित दीनदयाल उपाध्याय किसान ऋण योजना 0% में 98000 का ऋण भी दिया जा चुका है।

राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना को उत्तराखंड की धरती में उतारने वाले सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत कहते हैं मधुमक्खी पालन की उत्तराखंड में अपार संभावनाएं हैं मधुमक्खियों को बेहतरीन शहद देने के लिए अनुकूल वातावरण बनाया जा रहा है वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का इसमें सहयोग लिया गया है हनी के यह प्रयोग भी 2022 में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का किसानों की आय दोगुनी हो, लक्ष्य के साथ इसी कड़ी का हिस्सा है।

मधुमक्खी पालन कैसा हो, इसके लिए राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना के विशेषज्ञ किसानों को साल भर में ट्रेनिंग देंगे और उन्हें सिखाया जाएगा कि बक्से में कैसे शहद निकालना है और कैसे मधुमक्खियों के परिवार को बचाव करना है और मधुमक्खी के परिवारों का कुटुंब कैसे बढ़ाना है। प्रति किसान को 20 बॉक्स दिए जाएंगे। यह बॉक्स नोडल एजेंसी डी सी डी एफ मधुमक्खी पालक किसानों को उपलब्ध कराएगा। बॉक्स के अलावा सोम बैग मधुमक्खी पकड़ने के लिए, बी वेल मुख्य रक्षक जाली, भी किसानों को दी जाएगी। इसके अलावा स्मोकर, हनी स्टेक्शन नाइफ,बीकीपिंग फुल सूट, क्वीईन एक्सक्यूड़र, फ्रेम फीडर 1 किलो बैगशीट दी जायेगी।


शासन में सचिव और परियोजना के कार्यक्रम निदेशक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ आर मीनाक्षी सुंदरम मधुमक्खी पालन योजना पर विशेष रूप से फोकस कर रहे हैं, उनकी योजना है कि उत्तराखंड के शहद का डंका पूरा देश में बजे। और इसकी डिमांड ज्यादा से ज्यादा हो। जंगल में जैसे मधुमक्खी रहती हैं वैसे ही माहौल दिए जाने पर काम किया जा रहा है।

गढ़वाल रीजन में शहद दो प्रकार की मधुमक्खियों से अब तक निकलता आया है जिसमें एपिस सिराना इंडिका मधुमक्खी देसी मधुमक्खी है तथा एपीस मेलीफेरा विदेशी मधुमक्खी है। जो एग्रीकल्चर लीची जामुन से आता है पहाड़ की जंगली झाड़ से भी शहद जो आता है वह बेहतर माना जाता है।
मधुमक्खी परिवार एक परिवार में एक रानी कई हजार कमेरी तथा 100-200 नर होते है।

रानी यह पूर्ण विकसित मादा होती है एवं परिवार की जननी होती है। रानी मधुमक्खी का कार्य अंडे देना है अछे पोषण वातावरण में एक इटैलियन जाती की रानी एक दिन में 14 सौ से 18 सौ अंडे देती है। तथा देशी मक्खी करीब 7000 से 1000 अंडे देती है। इसकी उम्र औसतन 2 से 3 वर्ष होती है।

कमेरी / श्रमिक यह अपूर्ण मादा होती है और मौनगृह के सभी कार्य जैसे अण्डों बच्चों का पालन पोषण करना, फलों तथा पानी के स्त्रोतों का पता लगाना, पराग एवं रस एकत्र करना , परिवार तथा छतो की देखभाल, शत्रुओं से रक्षा करना इत्यादि इसकी उम्र लगभग 2 से 3 महीने होती है।

नर मधुमक्खी / निखट्टू यह रानी से छोटी एवं कमेरी से बड़ी होती है। रानी मधुमक्खी के साथ सम्भोग के सिवा यह कोई कार्य नही करती सम्भोग के तुरंत बाद इनकी मृत्यु हो जाती है और इनकी औसत आयु करीब 60 दिन की होती है।

डीसीडीएफ जो सहकारी विभाग की संस्था है। को नोडल एजेंसी बनाया गया है। वही किसानों से शहद खरीदेगा और मार्केटिंग भी करेगा उत्तराखंड में मधुमक्खियों के तीन सीजन होते हैं जुलाई-अगस्त 1 सीजन, दिसंबर जनवरी 2 सीजन, फरवरी-मार्च 3 सीजन, होते हैं। इसके लिए डीसी डीएफ और राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना ने पूरा खाका तैयार कर लिया है जिसमें मधुमक्खियां शहद देंगी वह बॉक्स बना दिए गए हैं एक बॉक्स में 1 साल में अपैक्स सिराना इंडिका देसी मधुमक्खी 6 केजी तक शहद दे सकती है। जबकि विदेशी मेलीफेरा 25 केजी से 35 केजी तक शहद दे सकती है।

इस तरह से 2000 किसानों को 20,000 बॉक्स मधुमक्खी पालन के लिए दिए जा रहे हैं जिसमें सालाना 120 मैंट्रिक टन शहद निकाला जाएगा। राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना के नोडल अधिकारी व सहकारिता विभाग में अपर निबंधक श्री आनंद एडी शुक्ल कहते हैं कि, जो किसान खेती, किसानी करते हैं उनको अतिरिक्त इनकम प्रदान करने के लिए मधुमक्खी पालन कराया जा रहा है।

शहद को जीवाणु निवारण रूप में प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में शहद के उत्पादन में काम करने वाली मधुमक्खियां  एंजाइम ग्लूकोज ऑक्सीडेज को नेक्टर में बदल देती हैं। जब शहद को घाव पर लगाया जाता है तो इस एंजाइम के साथ हवा की ऑक्सीजन के संपर्क में आते ही बैक्टीरीसाइड हाइड्रोजन पर आक्साइड बनती है। मनुका (मेडिहनी) औषधीय मधु होता है जिसके जीवाणु-रोधी कई तरह के स्रोतों से ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड आदि स्थानों से प्राप्त किए जाते हैं। वर्ष 2007 में हेल्थ कनाडा और यूएस एंड फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने क्रमश: पहली बार इस  मेडिसिनल हनी को घाव और जलने में प्रयोग की अनुशंसा की है। इनके अलावा शहद के प्रयोग से सूजन और दर्द भी दूर हो जाते हैं। घावों या सूजन से आने वाली दुर्गंध भी दूर होती है। शहद की पट्टी बांधने से मरे हुए ऊतकों की कोशिकाओं के स्थान पर नई कोशिकाएं पनप आती हैं। इस प्रकार मधु से घाव तो भरते ही हैं और उनके निशान भी नहीं रहते।

मधु एक ऊष्मा व ऊर्जा दायक आहार है तथा दूध के साथ मिलाकर यह सम्पूर्ण आहार बन जाता है। इसमें मुख्यतः अवकारक शर्कराएं, कुछ प्रोटीन, विटामिन तथा लवण उपस्थित होते हैं। शहद सभी आयु के लोगों के लिए श्रेष्ठ आहार माना जाता है और रक्त में  हीमोग्लोबिन  निर्माण में सहायक होता है। एक किलोग्राम शहद से लगभग 55 सौ कैलोरी ऊर्जा मिलती है। एक केजी शहद से प्राप्त ऊर्जा के तुलना दूसरे प्रकार के खाद्य पदार्थो में 65 अण्डों, 13 केजी, दूध , 8 केजी, प्लम,19 कि.ग्रा. हरे मटर 13 केजी सेब व 20 केजी गाजर  के बराबर हो सकता है।

मास्टड़ शहद 95% निर्यात होता है। मस्तड़ हनी सबसे बढ़िया राजस्थान, उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा,मध्य प्रदेश होता है। एक सर्वे के मुताबिक उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में गत वर्ष 6000 टन शहद मधुमक्खी पालकों ने निकाला। यहां का ज्यादातर शहद यूएसए और यूएई में निर्यात किया जाता है। इसी तरह से उत्तराखंड में भी मधुमक्खी पालन किया जा रहा है यह रोजगार का जरिया भविष्य में बनेगा।

एक आंकड़े के मुताबिक उत्तराखण्ड राज्य में साल भर में 2200 टन शहद उत्पादन किया जाता है मगर इसकी मांग पूरी नहीं की जा रही, क्योंकि कोरोना महामारी के दौरान शहद की मांग लगातार बढ़ रही है। इस क्षेत्रों में शहद लगभग 500-600 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है। मौनपालकों को ज्यादा  फायदे के लिए यह उत्पादित शहद मधु ग्राम केन्द्र से इक्कठा कर सीधा दूसरे देशों को निर्यात किया जाएगा क्योंकि यहां का शहद जैविक है और दूसरे राज्यों से अधिक गुणवत्ता पूर्ण है। उत्तराखंड में मधुपालन स्वरोजगार का सबसे बढ़िया माध्यम है, क्योंकि इस राज्य में अधिक गर्मी नहीं पड़ती और पेड़-पौधों का अधिक क्षेत्र के कारण यहाँ पूरे साल मधुमक्खी पालन किया जा सकता है। इस पालन से कम मेहनत पर ज्यादा आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।

प्राचीन काल से शहद तथा मधुमक्खियों के बारे में बहुत से संदर्भ विभिन्न ग्रंथों में मिलते हैं इसलिए शहद तब भी था और अब भी है यह बहुत उपयोगी है ज्यादातर इसे दवा में प्रयोग किया जाता है।

शीशपाल गुसाईं

 

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