प्रतापपुर दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति में गायें दे रही हैं ढाई सौ लीटर दूध…

कार्यक्रम निदेशालय , राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना उत्तराखंड द्वारा विभिन्न विभागों को दिया गया धन, अब जमीन पर दिखाई देने लगा है। सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत, और सचिव सहकारिता व मुख्य कार्यक्रम निदेशक डॉ. आर मीनाक्षी सुंदरम ने उधमसिंहनगर जनपद के प्रतापपुर दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति लिमिटेड को डेयरी फार्म की स्थापना के लिए 92.40 लाख रुपए जारी किए थे। डेयरी विभाग ने भी इस परियोजना में रात दिन काम किया।
दुग्ध सहकारी समिति ने जमीन पर सफलता की कहानी लिखी। 425.35 वर्ग मीटर का अत्याधुनिक पशुशाला शैड का निर्माण हो गया है। यहां 50 दुधारू पशुओं से प्रतिदिन 250 लीटर दूध मशीनों के माध्यम से निकाला जा रहा है।

समिति को ऑर्गेनिक सर्टिफाई करा दिया गया है। समिति तीन प्रकार के घी बना रही हैं पहला बद्री घी, दूसरा की पहाड़ी घी तीसरा की ऑर्गेनिक घी। जिसमें बद्री घी का लॉन्चिंग माननीय मुख्यमंत्री श्री तीरथ सिंह रावत जी ने 3 दिन पहले देहरादून में की थी। मुख्यमंत्री जी इस घी को बढ़ावा दे रहे हैं। यह बाजार में नाम से खूब ही बिक रहा है। लेकिन जड़ में राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना ही है। बद्रीनाथ भारत का एक चार धामों में प्रमुख धाम है। भगवान विष्णु के अवतार बद्रीनाथ धाम की स्थापना आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने की थी वह केरल के रहने वाले थे। बद्री घी के नाम से ब्रांडिंग तत्परता से करना, डेयरी विभाग की सराहना की जानी चाहिए यह नाम किसी निजी कंपनी के हाथ नहीं लगा। बहुत अच्छी बात है इस नाम की ब्रांडिंग सरकार खुद ही कर रही है।

संयुक्त निदेशक डेयरी, व राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना में डेयरी के प्रोजेक्ट निदेशक श्री जयदीप अरोड़ा ने बताया है कि इस दुग्ध समिति में बद्री घी के अलावा, पहाड़ी घी को ज्यादा बढ़ावा दिया जा रहा है। पहाड़ी घी चंपावत और पिथौरागढ़ जनपदों के दूध से बना रहे हैं यह भी टेस्टी घी है इस घी की अत्यधिक डिमांड है। क्योंकि यह परंपरागत है। ऑर्गेनिक  भी यहां बनाया जा रहा है दुधारू पशुओं को जो चारा दिया जाता है उसमें यूरिया, की बिल्कुल मात्रा नहीं रहती है पशु यहां गैर पेस्टिसाइड चारा खाते हैं उनसे निकले दूध से ऑर्गेनिक घी बनता है। और आर्गेनिक की तरफ कुछ लोगों का झुकाव दिखता है लोग ऑर्गेनिक घी की भी डिमांड कर रहे हैं।

अत्याधुनिक पशुशाला प्रतापपुर जिला (उधमसिंहनगर) में एक साथ 6 गायों से मशीनों के माध्यम से दूध निकाला जाता है। उत्तराखंड में यह तकनीक आधुनिक है। सदियों से दुधारू पशुओं का दूध दुहने में हाथों का इस्तेमाल होता है. ये हमारा पारंपरिक तरीका माना जाता है, लेकिन अब डेयरी फ़ार्मिंग की नई तकनीक आ गई हैं. इसी कड़ी में डेयरी फ़ार्मिंग और पशुपालन में एक मशीन ने क्रांति लाई है, जिसको मिल्किंग मशीन यानी दूध दुहने वाली मशीन के नाम से जाना जाता है. इस मशीन से दूध निकालना काफी आसान होता है, साथ ही दूध का उत्पादन लगभग 15 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.

मिल्किंग मशीन की शुरुआत डेनमार्क और नीदरलैंड से हुई, लेकिन आज यह तकनीक दुनियाभर में अपनाई जा रही है. कई डेयरी उद्योग और पशुपालक दूध निकालने के लिए मिल्किंग मशीन का उपयोग करते हैं. खास बात है कि मिल्किंग मशीन से पशुओं के थनों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है, साथ ही दूध की गुणवत्ता और उत्पादन में बढ़ोतरी होती है.

इस मशीन के उपयोग से कम लागत और समय की बचत होती है दूध में कोई गंदगी भी नहीं आती है. ये मशीन तिनके, बाल, गोबर और पेशाब के छींटों से भी बचाव करती है. जब पशुपालक दूध निकाल रहा होगा, तब पशु के खांसने और छींकने से भी दूध का बचाव होगा. इस मशीन के जरीए दूध सीधा थनों से बंद डब्बों में ही इकट्ठा होता है।

अपर निदेशक सहकारिता व समेकित परियोजना के नोडल अधिकारी श्री आनंद एडी शुक्ल ने बताया कि,डेयरी फार्म के अंतर्गत उत्पादित दूध के अतिरिक्त गोबर गैस का उपयोग विद्युत उत्पादन में किए जाने का भी प्रावधान रखा गया है। गोबर गैस से विद्युत उत्पादन होता है।गोबर का उपयोग जैविक खाद के रूप में किया जा रहा है।

डेयरी फार्म द्वारा उत्पादित दूध के मूल्य से एनसीडीसी ऋण के किस्त अदायिकी के उपरांत लगभग ₹800000 प्रति वर्ष की आय होगी।

राज्य के सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत कहते हैं कि, इस परियोजना से 2022 तक किसानों की आय दोगुनी होगी, यह प्रधानमंत्री जी का सपना है। जिस सपने को हम जमीन में उतार रहे हैं। दुग्ध पशुपालक को सीधा लाभ इस सहकारी परियोजना से हो रहा है।

 

शीशपाल गुसाईं

संपादक , राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना

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