छोटी बैणीं (बहन) का बेटा बना राजा …..

शीशपाल-गुसाईं शीशपाल गुसाईं

बात राजा नरेंद्र शाह की शादी की है। बारात टिहरी से हिमाचल कोटी कुंठल रियासत के राजा विजय सेन बहादुर के घर पर गई थी। तब शादियां करीब एक हफ्ते तक चलती थी। आना जाना कुछ दिन ससुराल में ही रहना। शादी की तिथि यानी फेरे लेने का कार्यक्रम 20 जनवरी 1916 का है।

राजा विजय की बड़ी बेटी के साथ युवराज नरेंद्र शाह उत्तराखण्ड की पहली महिला सांसद व पहली पद्मभूषण कमलेन्दुमति से जैसे ही वेदी (मंडप) में फेरे के लिए जाते हैं वैसे ही राजा विजय रोने (बुकरा बुकरी ) लगते हैं कि, बड़ी बेटी की शादी इतनी बड़ी रियासत में हो रही है। छोटी बेटी इंदुमती कहाँ और कैसी जायेगी ? कोटी कुंठल रियासत वैसे भी कर्जे में डूबी हुई थी, इसलिए राजा को युवराज नरेंद्र शाह के समकक्ष दूसरा दामाद मिलेगा या नहीं,यह चिंता तत्काल ही होने लगी। युवराज नरेंद्र शाह, ससुर के आंसू और दुख सहन नहीं कर पाए। उन्होंने और उनके गार्जियनो ने छोटी लड़की इंदुमती से शादी करने के लिए हां कर दी। एक ही बेदी (मंडप) में दोनों बहनों के साथ सात फेरे लेकर युवराज नरेंद्र शाह ने शादी रचाई। इस तरह नरेंद्र शाह, दोनों सगी बहनो से
शादी के बंधन में बंध गए। उन्हें डोला पालकी में टिहरी लाया गया।

युवराज नरेंद्र शाह की शादी का इनविटेशन महारानी नेपालियन की तरफ से था। जो राजा कीर्ति शाह की राणी थी और इनकी संतान थी नरेंद्र शाह। नरेंद्र शाह तब 13 साल के थे जब उनके पिता का देहांत हो गया था। फिर माँ और दादी ने गद्दी संभाली थी। इस शादी में कई रियासतो के राजा और
अंग्रेज अधिकारी शामिल हुये थे। एक ही मंडप में शादी की बात उनके राजा पुत्र मानवेन्द्र शाह अपनी आत्मकथा में लिखते हैं। राजधानी के रूप में नरेंद्र शाह द्वारा 1919 में नरेंद्रनगर को बसाया गया था तो दोनों महारानियाँ नरेंद्रनगर महल में आ गईं। बड़ी राणी कमलेन्दुमति की बेटी हो गई थी, वह पुनः गर्भवती हो गई थी। इधर छोटी राणी इंदुमति भी गर्भवती हो गई थी। राजमहल की एक प्रमुख दाई की भक्ति छोटी राणी की तरफ ज्यादा थीं। प्रसव प्रतापनगर महल में हुआ था। उनसे कुछ दिन पहले युवराज मानवेन्द्र पैदा हुए। यह सब किस्मत का ही खेल था। बड़ी राणी कमलेन्दु मति का कुँवर शार्दूल विक्रम पैदा हुये। इस तरह शार्दूल टिहरी गढ़वाल के राजा बनने से पिछड़ गए। शार्दूल के सगे भाई कुंवर बालेंदु थे। राजा के बड़े बेटे को राजकुमार बोला जाता है। छोटे को कुंवर। कुंवर की संतान और पीढ़ी को ठाकुर बोला जाता है। राजकुमार ही राजा बनता है। जो एक ही होता है।

कुछ समय के लिए नरेंद्र शाह धर्मसंकट में पड़ गए होंगे। जिस राणी के नाम पर उनकी बारात , हिमाचल गई थी, उसका बेटा नहीं, भावुकता में हुई शादी का छोटी राणी का बेटा उनका उत्तराधिकारी बन रहा है। बड़े की राजा बनने की परंपरा है। चाहे 1 दिन पहले पैदा होने का अंतर हो। मानवेन्द्र को छोटे से ही राजा बनेगा, राजमहल और अजमेर में मेयो कालेज से कैब्रिज परीक्षा पास करने बाद लाहौर में व्यवस्थाये दी जाने लगी। हालांकि उनके दो छोटे भाई भी साथ पढ़ते थे। लाहौर में * टिहरी हाऊस* था। वहीं पर यह तीनों बच्चे रहते थे। टिहरी से श्री एस शर्मा, और श्री मायाराम ग़ैरोला अध्यापक के रूप में उनके साथ टिहरी हाऊस में लाहौर में रहते थे।

मानवेन्द्र को एसडीएम जमीन बंदोबस्त, आईसीएस देहरादून की तामील इस लिये दी गई थी कि उन्होंने राजकाज संभालना है। इसलिए भूमि बंदोबस्त, प्रशासन चलाने का ज्ञान होना जरूरी था। वनों की पढ़ाई के लिए उन्हें लंदन जाना था, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के कारण लंदन जाने का प्रोग्राम उनका कैंसिल हो गया था। 6 फरवरी सन 1946 को नरेंद्र शाह ने अपनी अस्वस्थता के कारण अपने बेटे मानवेंद्र शाह को राजा की गद्दी पर बैठा दिया तथा शार्दुल विक्रम शाह भारत में अंग्रेज सरकार के अंतिम फील्ड मार्शल बूचर के एडीसी के रूप में लेफ्ट कर्नल रहे। उसके उपरांत आईएफएस अधिकारी रहे वह नेहरू जी के प्राइवेट सेक्रेटरी भी थे।तथा कई देशों में राजदूत भी रहे। तथा छोटे भाई बालेंदु शाह उच्च शिक्षा लेने के बाद बाद एयर इंडिया के डायरेक्टर कारगो पद पर रहे।

एक दिन नरेंद्र शाह ने दोनों राणी पत्नियों के साथ दिल्ली से कार से नरेंद्रनगर आ रहे थे, रास्ते में छोटी राणी इंदुमती ने कार चलाने की जिद की थी। नरेंद्र शाह ने उन्हें स्टेयरिंग दे दिया।
रुड़की के पास इंदुमती की कार पेड़ से जा टकराई और जो स्टेरिंग था वह उनकी छाती/ पेट में चुभ गया था। जहाँ से मानवेन्द्र निकले थे। उनकी वहीं पर मृत्यु हो गई थी। जीवित बचे राजा नरेंद्र और बड़ी राणी बड़ी बहन कमलेन्दुमति को दुख हुआ। लेकिन छोटी राणी का इतना ही दाना पानी था। बड़ी राणी खूब जीई। पहले चुनाव 1952 में सांसद बनी। वह विदुषी महिला थीं। राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी को टिहरी लाई थी। उन्होंने एक ट्रस्ट भी बनाया था। जो बुद्धिमान, निर्धन और दलित शोषित बालिकाओं की शिक्षा और हॉस्टल की व्यवस्था आज भी करता है। अपने सगे बेटों को इस ट्रस्ट में न रख कर, पिथौरागढ़ के एक ईमानदार सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी को उसका मुखिया बना दिया था। वह काम में पारदर्शिता चाहती थी। और न्याय प्रिय थी, इसीलिए उन्हें भारत सरकार ने उस जमाने पद्मभूषण से नवाजा था। वह उत्तराखंड में पहली महिला सांसद थी और पहली पद्मभूषण से सम्मानित होने वाली महिला।

 

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