गरीब बच्चों के ठक्कर बापा छात्रावास के लिए भिलंगना नदी से पीठ पर ढोये गए पत्थर और रेत

सुंदरलाल बहुगुणा जन्म से ही कुछ कर दिखाने वाले व्यक्तियों में रहे। वह मात्र 27 वर्ष के थे जब उन्होंने टिहरी के प्रताप इंटर कालेज के समीप ठक्कर बापा छात्रावास का निर्माण कराया था। बापू, महात्मा गांधी के गांधी जी के परम भक्त थे और छुआछूत के खिलाफ थे, जो गरीब बच्चे जिनके पास रहने का साधन नहीं था, वह पढ़ना चाहते थे, उनके लिए यह छात्रावास बापा के नाम से बनाया गया। भिलंगना नदी में कण्डल पुल के समीप से खड़ी चढ़ाई भादू की मगरी तक करीब 500 मीटर तक पत्थर ढोये गए और पीठ पर रेत भी लाया गया। सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में यह श्रमदान किया गया। तब इस छात्रावास का निर्माण 1954 में हो पाया।

सुंदरलाल बहुगुणा ने टिहरी के गांव-गांव में दलित छात्रों जो आगे नहीं पढ़ सकते थे उनकी ढूंढ की। 1958 में वह उत्तरकाशी के भटवाड़ी ब्लॉक के किलासू भंकोली गांव में पहुंचे। गांव और उत्तरकाशी की दूरी 25 किमी है। तब पैदल चलना एक साधन था। वहां ग्राम प्रधान गंगा सिंह से संपर्क किया कि,आपके गांव में कोई होशियार दलित छात्र है, जो आगे पढ़ना चाहता है, उसके लिए ठक्कर बापा छात्रावास इंतजार कर रहा है। जहां खाना रहना निःशुल्क है। ग्राम प्रधान ने पास में ही खेल रहे चंद्र सिंह का नाम सुझाया। उसने हाई स्कूल उत्तरकाशी से अच्छे नंबरों से पास किया था। लेकिन उत्तरकाशी जनपद में इंटर कालेज न होने के कारण आगे पढ़ने की समस्या भी थी। सुंदरलाल बहुगुणा ने चंद्र सिंह को, अपने साथ ही टिहरी ले आए और प्रताप इंटर कालेज में 11 वीं कक्षा में दाखिला दिला दिया और रहने का प्रबंध ठक्कर बाबा छात्रावास में था ही। छात्रावास और इंटर कालेज के बीच में विश्वविद्यालय के लिए चले आंदोलन के बाद, बहुत बाद स्वामी राम तीर्थ यूनिवर्सिटी कैम्पस खुला। इसके बारे में कभी बताएंगे बाद में विस्तार से। लेकिन पहले पहले प्रताप इंटर कॉलेज और छात्रावास के बीच में बहुत बड़ा मैदान था।

1961 में चन्द्र सिंह ने प्रताप इंटर कालेज से इंटरमीडिएट किया। वह आगे की पढ़ाई डीएवी कालेज देहरादून से करना चाहते थे। वह अपने दाखिले के लिए प्रमाण पत्र सर्टिफिकेट इत्यादि कक्षा करके टिहरी से देहरादून के लिए निकल गए। उसने पास उस 100 रुपये थे। ऋषिकेश टीजीएमओ स्टेशन पर उन्हें सुंदरलाल बहुगुणा मिल गए। बहुगुणा ने पूछा कि चंद्र सिंह कहां जा रहे हैं ? तो उन्होंने कहा गुरुजी डीएवी कालेज में एडमिशन लेने जा रहा हूं।

बहुगुणा उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय भेजना चाहते थे।
क्योंकि इस वक्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय का नाम पूरे देश में
था। उन्होंने चन्द्र सिंह को तांगे पर बिठाया और ऋषिकेश रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिए। वहां उन्होंने टिहरी के सेठ इंद्र सिंह से 40 रुपये चन्द्र सिंह के वास्ते दिलाये और एक कागज में दस्तखत करवाए। और अब चन्द्र सिंह के पास 140 रुपये हो गए थे। बहुगुणा जी ने उन्हें ट्रेन से विदा किया।
और अपने परिचितों से मिल कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लेने को कहा।उनकी इंटर में मैरिट अच्छी थी, तो
विश्वविद्यालय में दाखिला मिल गया। फिर उन्होंने बहुगुणा जी को चिठी लिखी कि दाखिल हो गया है। वह उनके अभिभावक थे। 1963 में उन्होंने बीए किया 1965 में उन्होंने एमए किया।

चन्द्र सिंह 1967 में वह उत्तर प्रदेश पीसीएस में सलेक्ट हो गए थे। उस साल एसडीएम के 4 पद आये थे। जिसमें 3 पद सामान्य और एक पद आरक्षित था। आरक्षित पद में चंद्र सिंह का चयन हो गया। बहुगुणा जी बहुत खुश हुए। लगाया हुआ पौधा कामयाब हो रहा था। इस प्रकार वह उत्तरकाशी टिहरी जिलों के पहले पीसीएस अधिकारी बने। उनकी पहली नियुक्ति एसडीएम बिजनौर हुई तो उन्होंने अपनी गुरुजी सुंदरलाल बहुगुणा को आमंत्रित किया। 1985 में उनकी आईएएस में पदोन्नति हो गई थी।

फिर वह मथुरा और मऊ में डीएम रहे तो, सुंदरलाल बहुगुणा
का ज्ञान और आशीर्वाद चंद्र सिंह को मिलता रहा। वह अपने पिता की तरह मानते थे। बहुगुणा ने उन्हें ईमानदारी का पाठ पढ़ाया था चन्द्र सिंह भी पूरी सर्विस काल तक एक ईमानदार अधिकारी रहे। 1985 में टिहरी बांध परियोजना के डूब क्षेत्र के लोगों को अन्य जगह बसाने का काम शुरू हुआ। टिहरी शहर के संस्थानों को नई टिहरी में बसाया गया था। तो एक बार फिर ठक्कर बापा छात्रावास को जमीन देने के लिए टीएचडीसी तैयार नहीं था। नई टिहरी में जिस जमीन पर यह छात्रावास दिया जाना था, उस जमीन पर एक ताकतवर नेता की नजर थी। ठक्कर बापा छात्रावास की किस्मत देखिए कि, 1998 में चन्द्र सिंह टिहरी बांध परियोजना के पुनर्वास निदेशक बन कर टिहरी चले गए। उन्होंने सबसे पहला काम ठक्कर बापा को बसाने का लेकर किया। उन्होंने कमेटी बनाई, कमेटी से यह काम करवाया। एक नामी अधिकारी नानुकुर कर रहे थे।
चन्द्र सिंह ने मुकदमे करने के आदेश दे दिया थे।फिर तुरन्त
नई टिहरी में 2 करोड रुपए की लागत से ठक्कर बापा छात्रावास बनाया गया। इस तरह से एक शिष्य ने अपना छात्रावास का निर्माण कराया।

नई टिहरी में तो काफी साधन रहने के हैं लेकिन 1954 में टिहरी में छात्रावास का होना बहुत बड़ी बात थी, तब लोग पढ़ते लिखते भी बहुत कम थे। पुरानी टिहरी के छात्रावास में कई विद्यार्थियों ने छात्रावास में रहकर आगे चलकर अपना नाम कमाया। कैबिनेट मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी भी इसी छात्रावास की देन हैं। ठक्कर बापा छात्रावास टिहरी में सामाजिक गतिविधियों का केन्द्र था। निर्धन, दलित और सामाजिक सरोकारों से मतलब रखने वाले छात्र इस छात्रावास में निवास करते थे। अस्पृश्यता निवारण और दलित जागरण इस छात्रावास का मुख्य उद्देश्य था। गाँधी जन्म शताब्दी वर्ष 1969 में पूरे देश में गाँधी जी के अनुयाइयों द्वारा मद्यनिषेध कार्यक्रम चलाये गये थे। टिहरी में भी गाँधी-विनोबा के अनुयायी सुन्दरलाल बहुगुणा ने मद्यनिषेध आन्दोलन चलाया। इससे पहले विनोबा जी की पदयात्राओं और भूदान ग्रामदान आन्दोलन में सक्रिय रहे थे। टिहरी, उत्तरकाशी के सर्वोदय सेवकों ने भूदान आन्दोलन चलाया। बहुगुणा जी ने गांव गांव जाकर गरीब छात्रों को पढ़ने के प्रेरित किया था।

शीशपाल गुसाईं

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