ऐसी थी पहले सिराई और भगीरथी नदी…

 शीशपाल गुसाईं

आज ऐसे ही  संयोग से fb पर आज के दिन सिराई के बारे में लिखा था। वह मेमोरी में रिपीट हुआ। आज ही मैं सिराई के ऊपर रुक कर गुजरा। सिराई के डूबने पर लोगों के कटोरे भर आये थे आंसू।

सिराई कस्बा , गांव का मरना या मारना ऐसा है जैसे परिवार में भाई का न रहना। उस बाज़ार में बचपन से आते – जाते इतनी यादें दी की, भूले नहीं भूलती। क्या नहीं था सिराई में ? गांव के लोग जब जुड़ते थे इकठ्ठा होते थे, कितना सजता था यह बाज़ार। लोग फसल काट कर सौदे पत्ते के लिये कस्बे पहुँचते थे। देश प्रदेश की नवीनतम खबरें यहां पहुँच कर पास लगी पट्टी के गांवों में जाती थीं।

घर में रह- रह कर याद आती है उन तस्वीरों की जिसमें सिराई, पुल, रैका पट्टी का रौलाकोट गांव है ।जब हम उच्च शिक्षा के लिए छाम से टिहरी जाते थे, घर आते थे तब जाते हुए, उप्पू के बाद सिराई पड़ता था। और आते हुए मालीदेवल गांव के बाद। जाते हुए क़स्बे को पार कर , गाड़ भी आती थी। उसे पार कर खड़ी चढ़ाई होती थी। 700 मीटर के करीब होगी ,सवारी बस चढ़ाई में फर्स्ट गेयर लगाई जाती होगी। सड़क के ठीक नीचे सिराई इंटर कालेज था। आते हुए उतराई होती थी। तब ऋषिकेश से गंगोत्री तक एक ही यही प्रमुख सड़क होती थीं। घर जाने के रास्ते में जैसे सिराई आता था तो सफर का आधा सुकून मिल जाता था। दिल में यह रहता था कि अब घर गांव आने ही वाला है।

कितना सुंदर था सिराई। बाज़ार सजा रहता था। क्योंकि इससे गांव जुड़े थे। जो चीज, टिहरी आई वह शाम या अगले दिन सिराई बाजार होती थी। पुराणी टिहरी से मुश्किल से 12 किलोमीटर दूर होगा। यहां से रैका पट्टी प्रतापनगर के लिए रास्ता जाता था। पुल के वजह से 90% लोग रैका के 20, 25 गांव के यहीं से जाते थे। ऊपर राम गांव से लेकर जितने गांव नीचे तक जुड़ें हैं , अठुर पट्टी और रैका पट्टी का मार्किट था। यहाँ भागीरथी नदी पर झूला पुल था। मैंने भी इस पुल से पैदल यात्रा की। यह पैदल पुल था। लेकिन बहुत लोग जाते आते थे सिराई बाजार। यह सौदे पत्ते का प्रमुख बाजार था।न जाने कितने लोगो की शादी यो का गवाह रहा यह पुल। गाड़ी तो भलड़ियाना से घूम के आती थी। लेकिन पैदल का यही आसरा था। 29 अक्टूबर 05 को अंतिम टनल बंद होने के बाद झील स्थाई रूप से बनने लगी। तो तीन चार माह बाद सिराई डूब ने का नंबर आ गया था। जब यह और आसपास के गांव डूबे तो लोगों के कटोरे भर आंसू देखने को मिले।
आखिर जहाँ वह पले बढ़े, कई पीढियां देखी उसका न रहना दुख तो देता ही है। उन के लिये खासकर है जो सन 2000 या 2005 के बाद
पैदा हुए हैं। वह साक्षात नहीं देख सकते हैं।

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